यशवंत गंजीर, धमतरी। “शहर तो शहर, आजकल गांवों से भी घरेलू चिड़िया (गौरैया) नाम मात्र रह गई हैं। बड़ी-बड़ी इमारतों और कंक्रीट के जंगलों के बीच हम इन मासूम पक्षियों को उनका आशियाना देना ही भूल गए।” लेकिन जब धुन सवार हो, तो एक अकेला इंसान भी बदलाव की बड़ी इबारत लिख सकता है।
विश्व पर्यावरण दिवस के खास मौके पर छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले से एक ऐसी ही दिल को छू लेने वाली और प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने पूरे क्षेत्र को गौरवान्वित किया है।
कुरुद विकासखंड के ग्राम मंदरौद के 25 वर्षीय युवा मोहन साहू पिछले 8 सालों (साल 2018) से विलुप्त हो रही गौरैया और अन्य पक्षियों को बचाने के लिए एक अनोखा ‘महाभियान’ चला रहे हैं। इन बेजुबान पक्षियों के आशियाने के लिए मोहन अब तक अपने निजी खर्च से लाखों रुपए लगा चुके हैं। उनकी इस निस्वार्थ मेहनत का ही नतीजा है कि आज मंदरौद सहित आसपास के तमाम गांवों में गौरैया की मधुर चहचहाहट फिर से लौट आई है।

लाखों खर्च कर तैयार किए हजारों आशियाने
बचपन में घरों के आंगन में फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या ने मोहन को झकझोर कर रख दिया था। इसी चिंता के बाद उन्होंने पक्षियों के संरक्षण का बीड़ा उठाया। मोहन अब तक स्वयं के खर्चे पर 3000 से अधिक लकड़ी के तथा 1000 के करीब टीन-पीपा के कृत्रिम घोंसले तैयार कर चुके हैं।
उन्होंने मंदरौद के अलावा सेल्दीप, जोरातराई, सिन्धौरीकला, सिन्धौरीखुर्द, बानगर, परसवानी, मेघा, अरौद, उमरदा, गाडाडीह, कमरौद, कुरुद, धमतरी, सिवनी और कुरुद कॉलेज जैसे दर्जनों ग्रामीण व शहरी इलाकों में इन घोंसलों को निःशुल्क बांटा है।
वैज्ञानिक सोच: रेडिएशन-मुक्त लकड़ी के घोंसले और अनूठे ‘सकोरे’
मोहन का यह प्रयास सिर्फ घोंसले लटकाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे उनकी वैज्ञानिक सोच भी है:
*रेडिएशन से सुरक्षा: लकड़ी से बने घोंसलों की बनावट इस तरह की गई है कि वहां मोबाइल टावरों का खतरनाक रेडिएशन प्रवेश नहीं कर पाता। इससे गौरैया सुरक्षित माहौल में अंडे देकर आसानी से चूजे पैदा कर पा रही हैं। अब तक इन घोंसलों से 500 से अधिक चूजे जन्म ले चुके हैं।

*चार खानों वाले आधुनिक सकोरे: टीन के पीपों को काटकर चारों दिशाओं से खुले आकर्षक सकोरे बनाए गए हैं। इनमें अलग-अलग खानों में विभिन्न प्रकार के दाने और बीचों-बीच पानी का पात्र रखा गया है, जिससे पक्षी अपनी भूख-प्यास आसानी से मिटा सकें।
राष्ट्रीय स्तर पर मिल चुका है सम्मान
मोहन ने हमसे बातचीत में बताया कि “गौरैया (वैज्ञानिक नाम: पैसर डोमेस्टिक) की भारत में मुख्य रूप से हाउस स्पैरो प्रजाति ही घरों में चहकती है। आज मोबाइल टावर रेडिएशन और कंक्रीट के मकानों के कारण इन पर संकट है। इन्हें बचाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।” उनके इस अनुकरणीय और भागीरथी प्रयास के लिए उन्हें ग्लोबल स्कालर्स फाउंडेशन, पुणे द्वारा ‘समाज भूषण अवार्ड’ से नवाजा गया है। साथ ही समाज गौरव समिति, रायपुर द्वारा प्रशंसा प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया जा चुका है।

नई पीढ़ी को सौंप रहे हैं जिम्मेदारी
मोहन अपने इस अभियान को सिर्फ खुद तक सीमित नहीं रखना चाहते। वे स्कूलों में जाकर बच्चों को पर्यावरण और पक्षी संरक्षण के प्रति जागरूक कर रहे हैं। वे बच्चों को मुफ्त में घोंसले और जरूरी सामग्री भी उपलब्ध कराते हैं ताकि आने वाली पीढ़ी भी प्रकृति से जुड़ सके। आज स्कूल, मंदिर, अस्पताल, खेल मैदान और मुक्तिधाम जैसी जगहों पर मोहन के लगाए घोंसलों में गौरैया के परिवार चहक रहे हैं।
पर्यावरण दिवस का संदेश:
मंदरौद गांव के इस युवा की कहानी गवाह है कि यदि समाज का हर व्यक्ति प्रकृति और जैव विविधता के संरक्षण के लिए छोटा सा कदम भी उठाए, तो बड़े बदलाव संभव हैं। आइए, इस पर्यावरण दिवस पर हम भी मोहन साहू की इस मुहिम से प्रेरणा लें और अपने घरों की छतों पर बेजुबानों के लिए दाना-पानी रखने का संकल्प लें।

