कटनी। बाणसागर परियोजना के विस्थापितों का सब्र अब जवाब दे रहा है। तीन दशक पहले अपना सब कुछ गंवा चुके इन ग्रामीणों ने आज विजयराघवगढ़ अनुविभागीय अधिकारी (एसडीएम) कार्यालय में अपनी पीड़ा दर्ज कराई। सैकड़ों आदिवासी ग्रामीणों ने शासकीय जमीन पर मालिकाना हक दिए जाने की मांग को लेकर एक ज्ञापन सौंपा।
ग्रामीणों ने प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि उन्हें इस जमीन से बेदखल किया गया, तो उनके पास जीवन समाप्त करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। इन परिवारों को वर्ष 1996 में बाणसागर परियोजना के कारण विस्थापित होना पड़ा था।
ग्राम डोली, पोड़ी, आमा, कोल, नवासता, करेहा, इटौरा और इटमा सहित कई गांवों के निवासी पुनर्वास की उचित व्यवस्था न होने के कारण पिछले 30 वर्षों से तालाब के किनारों पर झुग्गी-झोपड़ियां बनाकर रहने को मजबूर हैं। हर साल बारिश के मौसम में बाणसागर तालाब का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ का पानी इनके आशियानों को उजाड़ देता है।
जान-माल के लगातार होते नुकसान और प्रशासन की बेरुखी से तंग आकर अब इन परिवारों ने एकजुट होकर अपने अस्तित्व की लड़ाई शुरू की है। ग्रामीणों के अनुसार, उन्होंने रहने लायक जमीन की तलाश में उमरिया, शहडोल, कटनी, सतना और मैहर जिलों के चक्कर काटे, लेकिन कहीं भी शासकीय जमीन उपलब्ध नहीं हो सकी।

