विशेष रिपोर्ट: यशवंत गंजीर कुरुद (धमतरी) छत्तीसगढ़ की माटी का सबसे बड़ा लोक पर्व ‘अक्ति’ (अक्षय तृतीया) इस बार भक्ति और परंपरा के साथ-साथ तिथियों के फेर में भी उलझा नजर आ रहा है। जहां कुरुद क्षेत्र के कई गांवों में आज ठाकुर देव की पूजा के साथ हल-नागर की गूंज सुनाई दी, वहीं प्रदेश के कई अन्य हिस्सों में उदया तिथि के गणित के चलते कल त्यौहार मनाने की तैयारी है। इस ‘असमंजस’ के बीच किसानों का उत्साह कम नहीं हुआ और उन्होंने मानसून की पहली दस्तक से पहले ही अपनी किस्मत के बीज ठाकुर देव के चरणों में सौंप दिए हैं।

परंपरा की पहेली: आज या कल?
इस वर्ष पंचांग के अनुसार अक्षय तृतीया की तिथि दो दिनों को छू रही है। इसका परिणाम यह हुआ कि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल दो मतों में बंट गए हैं:
आज का उत्साह: कुरुद सहित कई क्षेत्रों में ग्रामीणों ने आज ही ‘पुतरा-पुतरी’ की शादी रचाई और पितरों को तर्पण दिया।
कल की तैयारी: कई ग्राम पंचायतों और विद्वानों का मत है कि कल सूर्योदय के साथ तिथि की प्रधानता होने के कारण असली ‘अक्ति’ कल मनाई जाएगी।
ठाकुर देव की चौरी पर ‘प्रतीकात्मक जुताई’ का रोमांच
कुरुद के देवस्थलों पर आज एक अद्भुत दृश्य देखने को मिला। किसानों ने केवल पूजा नहीं की, बल्कि ‘भविष्य की खेती’ का खाका खींचा।
1. दोने में सौभाग्य: ग्रामीण दोने में धान, नारियल और नागर का लोहा लेकर पहुंचे।
2. नन्हें ‘बैल’ और युवा किसान: परंपरा का सबसे रोचक हिस्सा रहा बच्चों को ‘प्रतीकात्मक बैल’ बनाना। युवाओं ने बच्चों के कंधों पर जुआ (हल) रखकर मैदान में जुताई की, जो इस बात का संकेत है कि नई पीढ़ी अपनी जड़ों को नहीं भूली है।
3. बीज संस्कार: बैगा द्वारा अभिमंत्रित धान को लेकर किसान सीधे खेतों में पहुंचे और बुवाई की रस्म अदायगी की।
मालिक बना मेहमान: श्रम का अनूठा सम्मान
खोजी पड़ताल में एक और मार्मिक परंपरा सामने आई—’सांझी’ (अनुबंधित नौकर) की विदाई। आज के दिन साल भर पसीना बहाने वाला मजदूर ‘राजा’ की भूमिका में था। किसानों ने अपने घरों में पकवान बनाकर उन्हें खिलाया। यह महज एक अनुबंध की समाप्ति नहीं, बल्कि श्रम के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का छत्तीसगढ़िया अंदाज है।
मासूमों का ‘मया’: गुड्डे-गुड़ियों के मंडप में गूंजे मंगल गीत
गांव की गलियों में छोटे बच्चों ने ‘पुतरा-पुतरी’ के विवाह के माध्यम से बड़ों की दुनिया की नकल उतारी। तेल-माटी से लेकर भांवर तक की रस्में पूरी की गईं। मोहल्ले वालों ने भी इस ‘खेल-खेल के संसार’ में शामिल होकर पीले चावल के साथ ‘टीकवन’ (उपहार) भेंट किए।
आस्था और तर्पण: पितरों को पहला पानी
अक्ति का दिन केवल उत्सव का नहीं, बल्कि यादों का भी है। जिन परिवारों में बीते वर्ष किसी की मृत्यु हुई, वहां आज ‘अक्ति तर्पण’ किया गया। कुश और दूब की मदद से पूर्वजों को जल अर्पित कर खीर-पूड़ी का भोग लगाया गया।
बहरहाल तिथियों का असमंजस भले ही पंडितों और पंचांगों के बीच हो, लेकिन कुरुद के किसानों के लिए ‘अक्ति’ वह विश्वास है जो सूखी मिट्टी में सुनहरे भविष्य की उम्मीद बोता है। चाहे आज हो या कल, अक्ति का मूल संदेश—क्षय न होने वाला पुण्य—छत्तीसगढ़ के हर खेत और खलिहान में दिखाई दे रहा है।

