धमतरी। प्रदेश में ‘सुशासन’ का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, मुख्यमंत्री खुद ऑन-द-स्पॉट फैसले ले रहे हैं, लेकिन धमतरी जिला अस्पताल के बंद कमरों में संवेदनहीनता की एक ऐसी कहानी लिखी गई जिसने सरकारी दावों की धज्जियां उड़ा दीं। एक घायल नगर सैनिक अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझता रहा, अस्पताल की पार्किंग में लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस खड़ी रही, लेकिन जवान को मिला तो सिर्फ ‘नियमों का हवाला’ और ‘इंतजार’।
जांच रिपोर्ट: सफेद हाथी साबित हुई नई एंबुलेंस?
अभी कुछ ही दिन बीते हैं जब राज्य सरकार ने करोड़ों के बजट से जिलों में हाई-टेक लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस रवाना की थीं। धमतरी को भी इसका हिस्सा मिला। लेकिन 4 मई (सोमवार) को मरादेव फायरिंग रेंज में घायल हुए जवान के मामले में यह गाड़ियां महज शो-पीस साबित हुईं। सिर में गंभीर चोट होने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने हाथ खड़े कर दिए।
अस्पताल प्रशासन की दलील या शर्मनाक बहाना?
जब हमारी टीम ने इस अव्यवस्था की पड़ताल की, तो सिविल सर्जन डॉ. अरुण टोंडर का जवाब हैरान करने वाला था। उनके मुताबिक:
बहाना नंबर 1: “ड्राइवर खाना खाने गया था।” (सवाल: क्या आपातकालीन सेवाओं में बैकअप ड्राइवर का कोई प्रावधान नहीं है?)
बहाना नंबर 2:* “सरकारी एंबुलेंस निजी अस्पताल (रामकृष्ण केयर) नहीं जाती।” (सवाल: क्या मरीज की जान बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण कागजी प्रोटोकॉल है?)
निजी हाथों में ‘लाइफ सपोर्ट’ की कमान
सरकारी तंत्र की इस नाकामी के बीच *शिवा प्रधान* नामक व्यक्ति की निजी एंबुलेंस मसीहा बनी। अगर निजी वाहन न मिलता, तो देरी जवान की जान पर भारी पड़ सकती थी। यह घटना साबित करती है कि धमतरी जिला अस्पताल में ‘रेफरल’ का मतलब मरीज को सुविधा देना नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना है।
सवाल: जो जनता जानना चाहती है
1. अगर मुख्यमंत्री लापरवाही पर तत्काल कार्यवाही कर रहे हैं, तो ड्यूटी के समय ड्राइवर का ‘लापता’ होना क्या निलंबन का आधार नहीं है?
2. क्या ‘सुशासन तिहार’ सिर्फ आयोजनों तक सीमित है? धमतरी के इस मामले में जवाबदेही किसकी तय होगी?
3. क्या किसी घायल की जान बचाने के लिए एंबुलेंस का रूट तय करना मानवीय संवेदनाओं से ऊपर है?

