BY-यशवंत गंजीर कुरुद।
छत्तीसगढ़ की हाई-प्रोफाइल सीटों में शुमार कुरूद में होने वाली कांग्रेस की बहुप्रचारित ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ रैली फिलहाल टल गई है। जिस ‘जंगी सभा’ के लिए 25 मार्च की तारीख मुकर्रर मानी जा रही थी, उसे अब अप्रैल तक के लिए आगे बढ़ा दिया गया है। दिल्ली के व्यस्त सियासी समीकरणों और अंतरराष्ट्रीय हलचलों ने फिलहाल कुरूद के इस बड़े ‘पावर शो’ की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।CG NEWS
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इन तीन वजहों से फंसा पेच:
इन तीन वजहों से फंसा पेच:
पार्टी सूत्रों के अनुसार, शीर्ष नेतृत्व का शेड्यूल तीन बड़े मोर्चों पर उलझा हुआ है। पहला, पांच राज्यों में जारी विधानसभा चुनावों में केंद्रीय नेताओं की सघन व्यस्तता। दूसरा, दिल्ली में चल रहा संसद का महत्वपूर्ण सत्र और तीसरा, मिडिल ईस्ट (मध्य-पूर्व) में जारी तनाव, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिकताओं को बदल दिया है। इन कारणों से राहुल गांधी और अन्य दिग्गजों का छत्तीसगढ़ दौरा फिलहाल संभव नहीं हो सका।
मनरेगा के जरिए केंद्र की घेराबंदी
कांग्रेस इस रैली के माध्यम से केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ बड़ा मोर्चा खोलने की रणनीति बना रही है। पार्टी का सीधा आरोप है कि केंद्र सरकार बजट में कटौती और नियमों में बदलाव कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ ‘मनरेगा’ को कमजोर कर रही है। कुरूद को इस सभा के लिए चुनने का मुख्य कारण यहाँ का मजबूत किसान और ग्रामीण वोट बैंक है, जिनके लिए मनरेगा एक बड़ी लाइफलाइन है।
ग्राउंड पर तैयारी, पर नेतृत्व का इंतजार
रैली को लेकर उत्साह का आलम यह था कि फरवरी में ही प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने अपनी टीम के साथ कुरूद पहुंचकर संभावित सभा स्थलों का बारीकी से निरीक्षण किया था। स्थानीय कार्यकर्ता 25 मार्च को एक ऐतिहासिक जमावड़े की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन अब उन्हें अप्रैल की तपिश के बीच नई तारीख का इंतजार करना होगा।
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
जिला कांग्रेस अध्यक्ष तारणी नीलम चन्द्राकर ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय स्तर की व्यस्तताओं और संसद सत्र की गरिमा के कारण कार्यक्रम को आगे बढ़ाया गया है। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं का जोश कम नहीं हुआ है और शीर्ष नेतृत्व से समन्वय के बाद जल्द ही नई तिथि घोषित की जाएगी।
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सियासी मायने और विपक्ष के तंज
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राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि कुरूद का चयन कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि राहुल गांधी को सीधे ‘ग्राउंड’ से जोड़ने की एक सोची-समझी कोशिश है। हालांकि, ऐन वक्त पर रैली टलने से स्थानीय सियासत गरमा गई है। जहाँ कांग्रेस इसे तकनीकी कारणों से टलना बता रही है, वहीं विपक्षी खेमा इसे कांग्रेस की ‘ढुलमुल रणनीति’ करार देकर तंज कसने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा है। अब देखना होगा कि अप्रैल में होने वाली यह सभा छत्तीसगढ़ की राजनीति में क्या नया मोड़ लाती है।
