यशवंत गंजीर कुरुद। छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र की कार्यवाही को विराम लगे भले ही दो दिन बीत चुके हैं, लेकिन सदन के गलियारों में गूँज अब भी कुरुद विधायक अजय चंद्राकर के उन तीखे सवालों की है, जिन्होंने सत्ता की मेजों को हिलाकर रख दिया। सत्र के समापन के बाद जब सदन के भीतर की सक्रियता का आकलन किया जा रहा है, तो चंद्राकर की भूमिका केवल एक विधायक के रूप में नहीं, बल्कि लोकतंत्र के एक सजग पहरेदार के रूप में उभर कर आई है। उनके तेवरों ने यह सिद्ध कर दिया कि संसदीय मर्यादाओं के भीतर रहकर भी जनहित की लड़ाई कितनी प्रखरता से लड़ी जा सकती है।

अनुभव की सान पर चढ़े ‘पूरक प्रश्न’ :
सदन की पूरी कार्यवाही के दौरान अजय चंद्राकर ने ‘पूरक प्रश्नों’ को एक अचूक और तार्किक शस्त्र की तरह इस्तेमाल किया। उन्होंने केवल सवाल नहीं पूछे, बल्कि प्रशासन की उन नसों पर हाथ रखा जहाँ सुधार की सर्वाधिक आवश्यकता थी। मुख्य सवालों के जवाब में जब भी विभागीय स्तर पर ‘खानापूर्ति’ करने की कोशिश हुई, चंद्राकर ने अपने तथ्यों और अथाह संसदीय अनुभव से शासन को वास्तविक स्थिति पटल पर रखने के लिए विवश कर दिया।
संसदीय चातुर्य और ‘सात्विक आक्रामकता’ :
अजय चंद्राकर का संसदीय चातुर्य उनके सवालों की गहराई और नीतिगत समझ में साफ झलका। उन्होंने न केवल कमियाँ गिनाईं, बल्कि सुधार के लिए आईना भी दिखाया। सत्ता का हिस्सा होने के बावजूद जनहित के मुद्दों पर उनकी यह ‘सात्विक आक्रामकता’ यह सिद्ध करती है कि उनके लिए ‘जनकल्याण’ सर्वोपरि है। उनके तीखे सवालों ने कई बार मंत्रियों को बचाव की मुद्रा में आने पर मजबूर किया, जो वास्तव में जीवंत लोकतंत्र की एक सुखद तस्वीर है।
कुरुद से मंत्रालय तक: एक ‘परफेक्ट स्कोर’ का संदेश :
यद्यपि उन्होंने अपनी कर्मभूमि कुरुद के विकास और जनसमस्याओं के लिए 56 सवालों का एक ‘परफेक्ट स्कोर’ खड़ा किया, लेकिन उनकी दृष्टि का विस्तार समूचे छत्तीसगढ़ के कल्याण पर रहा। प्रदेश के किसानों की व्यथा हो, युवाओं के रोजगार का प्रश्न या फिर स्वास्थ्य सुविधाओं का बुनियादी ढांचा—चंद्राकर ने हर उस मोर्चे पर सवाल दागे जहाँ व्यवस्था की लगाम ढीली दिखाई दी। उनकी इस सक्रियता ने यह संदेश दिया कि वे सदन में केवल एक प्रतिनिधि नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों के रक्षक हैं।
सत्ता के भीतर सत्य की ‘हुंकार’ :
चंद्राकर की कार्यशैली की सबसे बड़ी विशेषता उनकी वैचारिक स्पष्टता रही। सत्ता पक्ष का हिस्सा होने के बावजूद, जनहित के मुद्दों पर उनकी यह बेबाकी एक स्वस्थ और परिपक्व परंपरा की परिचायक है। उन्होंने न केवल आंकड़े पेश किए, बल्कि नीतिगत विसंगतियों को भी पूरी निर्भीकता से उजागर किया।
”जब सत्ता पक्ष का ही कोई दिग्गज जनहित की वेदी पर अपनी ही व्यवस्था को आईना दिखाने का साहस करे, तो वह दृश्य लोकतंत्र की परिपक्वता का सबसे सुंदर प्रमाण बन जाता है।”
सत्र की समाप्ति के बाद अब यह स्पष्ट है कि अजय चंद्राकर के इन तीखे तेवरों और प्रखर सवालों ने जहाँ मंत्रियों को हर पल चौकन्ना रखा, वहीं सदन को यह विश्वास भी दिलाया कि जनसरोकारों की रक्षा के लिए तर्कों की मशाल हमेशा प्रज्वलित रहेगी।

