कुरुद । भालुझुलन में प्रस्तावित औद्योगिक पार्क अब केवल एक सरकारी प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि प्रशासन और ग्रामीणों के बीच साख की लड़ाई बन गया है। बुधवार को गांव की शांति तब भंग हो गई जब उद्योग विभाग की टीम बाउंड्री के खंभे लेकर पहुंची। ग्रामीणों ने न केवल काम रुकवाया, बल्कि साफ कर दिया कि बिना ‘निस्तारी’ के ‘विकास’ उन्हें मंजूर नहीं है।
पड़ताल: आखिर ग्रामीण क्यों हैं नाराज?
जब ग्रामीणों से बात की और मामले की तह तक जाने की कोशिश की, तो तीन बड़े सवाल सामने आए जो प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाते हैं:
वादाखिलाफी का आरोप: 12 फरवरी को जब पहली बार बवाल हुआ, तब तहसीलदार ने वादा किया था कि गांव के प्रतिनिधियों के साथ बैठकर रास्ता निकाला जाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि कोई बैठक नहीं हुई और सीधे निर्माण की तैयारी शुरू कर दी गई। संवाद की इस कमी ने “अविश्वास” की खाई को और गहरा कर दिया है।
नक्शे की ‘चोरी’ और भूमिपूजन का विवाद: ग्रामीणों का गंभीर आरोप है कि उद्योग भालुझुलन की 11 हेक्टेयर (लगभग 27 एकड़) जमीन पर बन रहा है, लेकिन इसका भूमिपूजन पड़ोसी गांव डांडेसरा में किया गया। लोगों का कहना है कि प्रशासन ने विरोध से बचने के लिए यह ‘चोरी-छिपे’ वाला रास्ता अपनाया।
भविष्य का संकट: गांव का गणित सीधा है—अगर 11 हेक्टेयर जमीन उद्योग ले लेगा, तो आने वाली पीढ़ी के लिए घर (आबादी भूमि), पशुओं के लिए चारागाह और अंतिम संस्कार के लिए मुक्तिधाम कहां बचेगा?
*बदला हुआ सुर: “हम विकास के दुश्मन नहीं”
इस बार आंदोलन में एक नई बात निकलकर आई। ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि वे ‘एंटी-डेवलपमेंट’ नहीं हैं। उनका कहना है, “हमें उद्योग से दिक्कत नहीं है, हमें अपनी बुनियादी जमीन खोने से डर है।” ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन पहले आबादी विस्तार और निस्तारी के लिए जमीन का अलग टुकड़ा सुरक्षित करे, उसके बाद ही उद्योगों की बात हो।
वर्तमान स्थिति: पुलिस बल बनाम जनशक्ति
फिलहाल भालुझुलन में माहौल शांत लेकिन तनावपूर्ण है। प्रशासन ने एहतियातन पुलिस की तैनाती कर दी है, पर ग्रामीणों का हौसला डिगा नहीं है। ग्रामीण एक ही बात पर अड़े हैं—”जब तक हक की जमीन सुरक्षित नहीं, तब तक एक ईंट नहीं लगेगी।”

