कुरूद/छत्तीसगढ़।
छत्तीसगढ़ में शिक्षा के ताज़ा आंकड़ों ने एक ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जो जहां बेटियों की प्रगति की कहानी कहती है, वहीं लड़कों के शिक्षा से दूर होते जाने की गंभीर चिंता भी जाहिर करती है। हाईस्कूल और हायर सेकेंडरी बोर्ड परीक्षाओं के आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि बड़ी संख्या में लड़के पढ़ाई की मुख्यधारा से बाहर हो रहे हैं, जिससे सामाजिक संतुलन पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
आंकड़ों में बढ़ता अंतर, 12वीं में लिंगानुपात 1390:
आंकड़ों के अनुसार, कक्षा 10वीं में करीब 1.40 लाख लड़कों के मुकाबले 1.76 लाख से अधिक लड़कियां परीक्षा में शामिल हुईं, जिससे लिंगानुपात 1255 दर्ज किया गया। वहीं 12वीं में यह अंतर और अधिक बढ़ गया—करीब 1.02 लाख लड़कों के मुकाबले 1.42 लाख से ज्यादा लड़कियां परीक्षा में बैठीं। इस तरह 12वीं में लिंगानुपात 1390 तक पहुंच गया, जबकि इस आयु वर्ग में सामान्य लिंगानुपात 950 से 970 के बीच माना जाता है। यह साफ संकेत है कि बड़ी संख्या में किशोर बीच में ही पढ़ाई छोड़ रहे हैं।
कम उम्र में जिम्मेदारी, पढ़ाई से दूरी:
जमीनी पड़ताल में सामने आया है कि 10वीं से पहले ही हर हजार में लगभग 300 लड़के स्कूल छोड़ देते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में लड़कों पर कमाने का दबाव अधिक होता है, जिसके चलते वे मजदूरी या छोटे-मोटे काम में लग जाते हैं। परिवार उन्हें ‘कमाने वाला हाथ’ मानकर जल्दी काम पर भेज देते हैं, जिससे उनकी शिक्षा बीच में ही छूट जाती है।
नशे की बढ़ती प्रवृत्ति भी कारण;
कुछ मामलों में यह भी सामने आया है कि किशोर लड़कों में नशे की ओर झुकाव बढ़ रहा है, जो उन्हें पढ़ाई से दूर कर रहा है। यह प्रवृत्ति न केवल उनकी शिक्षा, बल्कि उनके भविष्य के लिए भी खतरा बनती जा रही है।
बेटियों के लिए योजनाएं साबित हो रहीं कारगर:
दूसरी ओर, साइकिल वितरण, छात्रवृत्ति और अन्य प्रोत्साहन योजनाओं का सकारात्मक असर लड़कियों की शिक्षा पर साफ नजर आ रहा है। बालिकाएं न केवल स्कूलों में टिके रहने में सफल हो रही हैं, बल्कि उच्च कक्षाओं तक भी पहुंच रही हैं और बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं।
आंकड़ों से परे भी है सच्चाई:
कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सभी लड़के पूरी तरह शिक्षा से बाहर नहीं हो रहे हैं। कई परिवार अपने बेटों को निजी स्कूलों, कोचिंग संस्थानों या तकनीकी शिक्षा के लिए बाहर भेजते हैं, जिससे वे बोर्ड परीक्षाओं के आंकड़ों में शामिल नहीं हो पाते। इसके बावजूद मौजूदा स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भविष्य पर पड़ सकता है असर:
शिक्षाविदों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले समय में श्रम बाजार, सामाजिक ढांचे और आर्थिक संतुलन पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ेगा। एक ओर बेटियों का आगे बढ़ना सकारात्मक संकेत है, लेकिन लड़कों का शिक्षा से दूर होना चिंता का विषय बन गया है।
समाधान की जरूरत—संतुलन ही है भविष्य:
विशेषज्ञों के अनुसार, अब समय आ गया है कि शिक्षा, समाज कल्याण और रोजगारोन्मुखी योजनाओं को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाया जाए। साथ ही परिवारों में जागरूकता लाकर यह सुनिश्चित करना होगा कि लड़कों को भी शिक्षा से जोड़े रखा जाए। तभी समाज में संतुलन कायम रह सकेगा और प्रदेश की युवा पीढ़ी सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ सकेगी।

