BY यशवंत गंजीर धमतरी।
प्रदेश में तबादलों पर सरकारी ‘बैन’ की मुहर लगी है, लेकिन शिक्षा विभाग में यह मुहर शायद पानी की निकली! जब प्रदेश के हजारों शिक्षक सामान्य तबादला प्रक्रिया शुरू होने का इंतजार कर रहे हैं, तब विभाग के गलियारों से निकलते चोरी-छिपे आदेशों ने खलबली मचा दी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या नियम सिर्फ आम शिक्षकों के लिए हैं, और ‘खास’ लोगों के लिए विभाग के पिछले दरवाजे (Backdoor) हमेशा खुले रहते हैं?
’आपसी सहमति’ का खेल या प्रशासनिक सेटिंग?
खबरों की मानें तो ‘प्रशासनिक व्यवस्था’ और ‘आपसी सहमति’ जैसे भारी-भरकम शब्दों का कवच पहनकर तबादलों का एक बड़ा खेल चल रहा है। ताज़ा मामला मुंगेली और बिलासपुर का है, जहाँ पथरिया (मुंगेली) के एक व्याख्याता को चुपके से बांका (बिल्हा, बिलासपुर) भेज दिया गया।
यही नहीं, तबादलों की यह एक्सप्रेस जशपुर से रायपुर तक दौड़ रही है। पत्थलगांव (जशपुर) और धरसींवा (रायपुर) के बीच सहायक शिक्षकों की ‘आपसी अदला-बदली’ ने सबको हैरान कर दिया है। जानकारों का कहना है कि जब सरकार ने ट्रांसफर पर आधिकारिक रोक लगा रखी है, तो ये ‘म्युचुअल’ वाले आदेश आखिर किस जादुई पेन से साइन हो रहे हैं?
सोशल मीडिया पर वायरल ‘सीक्रेट’ लिस्ट!
विभागीय आदेशों की एक लंबी फेहरिस्त अब हवा में तैर रही है। इसमें धमतरी के मगरलोड से खरखुली, मुंगेली के बैहाकापा से राजधानी रायपुर के संजय नगर, और डोंगरगढ़ के घोटिया से बिलासपुर के हरदीकला तक के नाम शामिल हैं। मजेदार बात यह है कि कुरूद (धमतरी) के एक हाई स्कूल से शिक्षक सीधे जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय (DEO) में ही ‘लैंड’ कर गए हैं।
इन आदेशों में एक कॉमन लाइन लिखी है— “अस्थायी रूप से, आगामी आदेश तक”। शिक्षकों के बीच चर्चा है कि यह ‘आगामी आदेश’ दरअसल वह ढाल है, जिसके पीछे सेटिंग के खेल को छिपाया जा रहा है।
350 की बड़ी खेप: क्या है पर्दे के पीछे की कहानी?
सूत्रों का दावा है कि लगभग 350 प्राचार्य और व्याख्याताओं की एक बड़ी सूची तैयार की गई है। क्या नियमों का यह लचीलापन उन शिक्षकों को भी मिलेगा जो सालों से दुर्गम क्षेत्रों में ईमानदारी से डटे हैं? या फिर तबादला केवल उनके लिए मुमकिन है जिनके पास ‘प्रभाव’ की चाबी है?
पारदर्शिता पर लगा ‘प्रश्नचिह्न’
शिक्षा विभाग में जारी इस गुपचुप तबादला उद्योग ने विभाग की निष्पक्षता को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आम शिक्षक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। अब देखना यह है कि इस ‘ट्रांसफर स्कैम’ पर उच्चाधिकारी चुप्पी तोड़ते हैं या फिर ‘आगामी आदेश तक’ यह सिलसिला यूँ ही पर्दे के पीछे से चलता रहेगा।

