धमतरी। जिले की सहकारी समितियों में कर्मचारियों की भारी कमी का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। वर्षों से खाली पड़े पद, बढ़ता कामकाज और कर्मचारियों पर असामान्य दबाव—इन सबके बीच अब प्रशासन ने जल्द भर्ती का आश्वासन दिया है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह आश्वासन हकीकत में बदलेगा या पहले की तरह फाइलों में ही सिमट जाएगा?
सहकारी समिति कर्मचारी संघ के जिला कार्यवाहक अध्यक्ष नरेंद्र कुमार साहू के मुताबिक, कलेक्टर और उप पंजीयक के साथ हुई बैठक में नई भर्ती समेत कई मांगों पर सकारात्मक संकेत मिले हैं। यह भी बताया गया कि केंद्र सरकार की “सहकार से समृद्धि” योजना के तहत जिले में पैक्स (PACS) का तेजी से विस्तार हो रहा है। पहले जहां 74 समितियां थीं, वहीं 22 नई समितियों के जुड़ने से संख्या बढ़कर 96 तक पहुंचने वाली है।
काम बढ़ा, स्टाफ नहीं—कौन संभालेगा जिम्मेदारी?
जांच में सामने आया है कि समितियों के जिम्मे सिर्फ धान खरीदी या ऋण वितरण ही नहीं, बल्कि राशन वितरण, दलहन-तिलहन खरीदी, सीएससी सेवाएं, माइक्रो एटीएम, उज्ज्वला गैस और प्रधानमंत्री औषधि केंद्र जैसी कई योजनाएं भी हैं। यानी जिम्मेदारियां लगातार बढ़ती गईं, लेकिन कर्मचारियों की संख्या जस की तस रही। नतीजा—एक-एक कर्मचारी पर कई-कई काम का बोझ।

15 साल से भर्ती ठप, कर्मचारी बेहाल:
संघ का दावा है कि पिछले 10-15 वर्षों से नियमित भर्ती नहीं होने के कारण हालात बदतर हो चुके हैं। कई समितियां ऐसे चल रही हैं जहां स्टाफ न्यूनतम है या अस्थायी कर्मचारियों के भरोसे काम चल रहा है। ऑनलाइन सिस्टम लागू होने के बाद काम और जटिल हो गया है, जिससे कर्मचारियों पर दोहरा दबाव बन गया है।
मांगें सिर्फ भर्ती तक सीमित नहीं:
संघ ने सिर्फ नई भर्ती ही नहीं, बल्कि 27% महंगाई भत्ता, दैनिक कर्मचारियों को बोनस अंक, पदोन्नति और समितियों में बचत बैंक सेवाएं फिर से शुरू करने जैसी मांगें भी रखी हैं। खास तौर पर खरीफ सीजन के पहले पर्याप्त स्टाफ की नियुक्ति की मांग को लेकर जोर दिया गया है।
आश्वासन बनाम हकीकत:
कलेक्टर और उप पंजीयक ने मांगों पर सकारात्मक विचार और जल्द कार्रवाई का भरोसा दिया है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इससे पहले भी कई बार ऐसे आश्वासन दिए जा चुके हैं। हर बार उम्मीदें जगीं, लेकिन ठोस नतीजे सामने नहीं आए।
अब देखना यह होगा कि इस बार प्रशासन की पहल कागजों से निकलकर धरातल पर उतरती है या नहीं। क्योंकि अगर समय रहते भर्ती नहीं हुई, तो आने वाले खरीफ सीजन में समितियों की व्यवस्था चरमरा सकती है—जिसका सीधा असर किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

