धमतरी। कागजों में अक्सर सफल दिखने वाली योजनाएं जब जमीन पर उतरती हैं, तो हकीकत कुछ और होती है। लेकिन ग्राम पंचायत पोटियाडीह की तस्वीर इस सामान्य धारणा को चुनौती देती नजर आ रही है। यहां मनरेगा और एनआरएलएम के अभिसरण से किए जा रहे कार्य अब जांच के दायरे में नहीं, बल्कि चर्चा के केंद्र में हैं।
जनपद पंचायत धमतरी की सीईओ वर्षा रानी चिकनजूरी के हालिया निरीक्षण ने इन गतिविधियों पर रोशनी डाली। सामुदायिक बाड़ी, नर्सरी और वृक्षारोपण जैसे कार्य केवल फाइलों तक सीमित हैं या वास्तव में ग्रामीणों की जिंदगी बदल रहे हैं—यह जानने के लिए जब जमीनी हकीकत देखी गई, तो कई सकारात्मक संकेत सामने आए।
गांव की सामुदायिक बाड़ी में उग रही सब्जियां सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की कहानी कहती हैं। पहले बाजार पर निर्भर रहने वाले ग्रामीण अब खुद उत्पादन कर रहे हैं। स्व-सहायता समूह की महिलाओं की सक्रियता ने इस पहल को गति दी है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ रह पाएगा?
वहीं, नर्सरी और वृक्षारोपण कार्यों में स्थानीय भागीदारी दिख रही है, जिससे रोजगार के अवसर तो बढ़े हैं, पर इन पौधों की देखरेख और संरक्षण भविष्य की असली परीक्षा होगी। औषधीय खेती के तहत खस की फसल को लेकर उत्साह जरूर है, लेकिन बाजार से जुड़ाव और उचित मूल्य मिलना अभी भी एक चुनौती बना हुआ है।
निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने प्रगति पर संतोष जताया, लेकिन जमीनी सच्चाई यह भी बताती है कि योजनाओं की सफलता सिर्फ शुरुआत से नहीं, बल्कि निरंतर निगरानी और बाजार से जुड़ाव पर निर्भर करेगी।
पोटियाडीह फिलहाल एक ‘मॉडल’ के रूप में उभर रहा है, मगर असली सवाल यही है—क्या यह बदलाव स्थायी होगा या समय के साथ फाइलों में सिमट जाएगा?


