BY-CG Desk
बलरामपुर – ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई धरती आबा ग्रामीण उत्कर्ष योजना बलरामपुर जिले में प्रशासनिक लापरवाही और विभागीय खींचतान की वजह से ठप पड़ गई है। करीब 19 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित 9 छात्रावासों का निर्माण आज तक शुरू नहीं हो सका है। स्थिति यह है कि योजना को मंजूरी मिले एक साल से अधिक समय हो चुका है, लेकिन जमीनी स्तर पर एक भी ईंट नहीं रखी गई।

योजना की शुरुआत और शुरुआती प्रक्रिया

योजना की शुरुआत और शुरुआती प्रक्रिया
BALRAMPUR NEWS
सरकार ने इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत राशि शिक्षा विभाग को जारी की थी, ताकि ग्रामीण छात्रों को बेहतर आवासीय सुविधा मिल सके। मई 2025 में 7 करोड़ रुपये की पहली किश्त छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड को दी गई और निर्माण के लिए टेंडर प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई।
हालांकि, शुरुआती चरण में ही काम की रफ्तार धीमी पड़ गई। निर्माण एजेंसी ने बारिश का हवाला देते हुए काम में देरी की बात कही, जिससे परियोजना की गति थम गई।

एजेंसी बदली, लेकिन काम नहीं बढ़ा

एजेंसी बदली, लेकिन काम नहीं बढ़ा
काम में लगातार देरी को देखते हुए जिले के कलेक्टर ने निर्माण एजेंसी बदलने का निर्णय लिया। हाउसिंग बोर्ड से काम हटाकर इसे मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क योजना (CMGSY) विभाग को सौंप दिया गया।
यहीं से विवाद की स्थिति पैदा हो गई।
हाउसिंग बोर्ड के पास अभी भी 7 करोड़ रुपये की राशि अटकी हुई है
शिक्षा विभाग द्वारा पत्राचार के बावजूद राशि वापस नहीं की गई
नई एजेंसी के पास निर्माण शुरू करने के लिए पर्याप्त फंड उपलब्ध नहीं है
नतीजतन, एजेंसी परिवर्तन के बाद भी परियोजना पूरी तरह ठप हो गई और लगभग एक साल से काम आगे नहीं बढ़ सका।

निर्माण एजेंसी को लेकर उठे सवाल

निर्माण एजेंसी को लेकर उठे सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि भवन निर्माण का काम सड़क निर्माण से जुड़े विभाग को सौंपना कितना उचित है।
हाउसिंग बोर्ड भवन निर्माण में विशेषज्ञ संस्था मानी जाती है
CMGSY मुख्यतः सड़क निर्माण के लिए जाना जाता है
ऐसे में इतनी बड़ी इमारत निर्माण परियोजना को सड़क विभाग को देना प्रशासनिक निर्णय पर सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फैसले परियोजना की गुणवत्ता और समयसीमा दोनों को प्रभावित कर सकते हैं।
एक ही अधिकारी के पास तीन विभागों की जिम्मेदारी
जिले में प्रशासनिक व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है।
जानकारी के अनुसार, RES, PMGSY और CMGSY—इन तीनों विभागों में एक ही अधिकारी कार्यपालन अभियंता का प्रभार संभाल रहा है।
इस स्थिति में निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। जब एक ही व्यक्ति कई विभागों की जिम्मेदारी संभाले, तो कार्य की गुणवत्ता और समय पर निष्पादन प्रभावित होना स्वाभाविक है।
पहले भी उठ चुके हैं गंभीर सवाल
यह पहला मामला नहीं है जब संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हों।
- शाला जतन योजना में निर्माण गुणवत्ता को लेकर शिकायतें सामने आई थीं
- चेक डैम निर्माण में अनियमितताओं के आरोप लगे
- प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत घटिया निर्माण की शिकायतें भी सामने आईं
इन सबके बावजूद उसी अधिकारी को कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं की जिम्मेदारी सौंपना प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।
जवाबदेही और भविष्य पर सवाल
अब जिले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस योजना का भविष्य क्या होगा।
छात्रावास निर्माण कार्य कब शुरू होगा?
हाउसिंग बोर्ड के पास फंसी राशि कब वापस आएगी?
निर्माण की जिम्मेदारी आखिर किस एजेंसी को दी जाएगी?
यदि इन सवालों के जवाब जल्द नहीं मिले, तो आशंका है कि यह योजना भी अन्य योजनाओं की तरह कागजों में ही सिमट कर रह जाएगी।
निष्कर्ष
सरकार की मंशा स्पष्ट है—ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा को बढ़ावा देना और छात्रों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना। लेकिन बलरामपुर जिले में प्रशासनिक उदासीनता और विभागीय खींचतान इस उद्देश्य को कमजोर करती नजर आ रही है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या 19 करोड़ रुपये की यह योजना जमीन पर उतर पाती है या फिर फाइलों में ही दम तोड़ देती है।
