BY यशवंत गंजीर कुरुद।
कहते हैं कि ईश्वर हर जगह नहीं हो सकता, इसलिए उसने ‘माँ’ बनाई। छत्तीसगढ़ के कुरुद निवासी सुप्रसिद्ध चित्रकार बसंत साहू। का जीवन इस कहावत का जीवंत प्रमाण है। 31 वर्षों के बिस्तर पर बीते संघर्ष और 95% दिव्यांगता के बावजूद, यदि आज बसंत की कला देश-विदेश में अपनी चमक बिखेर रही है, तो उसके पीछे उनकी माँ श्रीमती अहिल्या साहू की अटूट तपस्या है।
हादसे ने छीनी गति, माँ ने दी नई शक्ति:
15 सितंबर 1995 का वह शुक्रवार बसंत की जिंदगी का सबसे काला दिन था। एक सड़क हादसे ने उनकी स्पाइनल कॉर्ड को ऐसी चोट पहुंचाई कि गले के नीचे का पूरा शरीर सुन्न हो गया। मात्र 23 साल की उम्र में डॉक्टरों ने उन्हें मृतप्राय घोषित कर दिया और कह दिया कि वे अब कभी उठ-बैठ नहीं पाएंगे।
जहाँ दुनिया ने साथ छोड़ दिया था, वहाँ उनकी माँ अहिल्या बाई दीवार बनकर खड़ी हो गईं। उन्होंने न केवल बेटे की शारीरिक देखभाल की, बल्कि उसे हार न मानने का हौसला भी दिया। विडंबना देखिए, जिस दौरान वह अपने बेटे को मौत के मुंह से बाहर निकाल रही थीं, वह खुद ब्रेस्ट कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रही थीं। अपनी तकलीफ को भुलाकर बेटे के सपनों में रंग भरना ही उनका एकमात्र लक्ष्य बन गया।
कैनवास पर उतरी हिम्मत की दास्तां:
बिस्तर पर पड़े-पड़े बसंत ने हार मानने के बजाय रंगों को अपना साथी बनाया। शरीर की सीमाओं को दरकिनार करते हुए, उन्होंने अपनी कल्पनाओं को कैनवास पर उतारना शुरू किया। छत्तीसगढ़ की लोक कला, आध्यात्मिकता और सामाजिक चेतना उनकी पेंटिंग्स का आधार बनीं। आज उनकी बनाई कलाकृतियां राष्ट्रपति भवन से लेकर कई प्रतिष्ठित संस्थानों की शोभा बढ़ा रही हैं। इसी का परिणाम है कि बसन्त को देश के सर्वोच्च सम्मान राष्ट्रपति पुरुस्कार से नवाजा गया।
बसंत फाउंडेशन’: माँ की प्रेरणा से बदल रहा बच्चों का भविष्य
बसंत साहू ने अपनी सफलता को केवल खुद तक सीमित नहीं रखा। माँ के सेवाभाव से प्रेरित होकर उन्होंने ‘बसंत फाउंडेशन’ की स्थापना की। बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों और जरूरतमंद दिव्यांग बच्चों को निःशुल्क चित्रकला सिखाना। उनके सिखाए कई बच्चे आज खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में शिक्षा पा रहे हैं। सैकड़ों बच्चे आज कला के माध्यम से आत्मनिर्भर बन रहे हैं।।
> “माँ सिर्फ जन्म नहीं देती, वह हौसला जगाकर असंभव को संभव बनाती है। आज मैं जो कुछ भी हूँ, वह मेरी माँ के त्याग और उनके आशीर्वाद का ही प्रतिफल है।”
> — बसंत साहू, चित्रकार
एक माँ की तपस्या, समाज के लिए रोशनी:
अहिल्या बाई साहू आज केवल एक माँ नहीं, बल्कि साहस और अटूट विश्वास की मिसाल हैं। उन्होंने साबित किया कि एक माँ की ममता में वह शक्ति है जो न केवल अपने बच्चे को पुनर्जीवन दे सकती है, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा की मशाल भी जला सकती है।
इस मदर्स डे पर, ‘बसंत फाउंडेशन’ और पूरा छत्तीसगढ़ ऐसी माँ को नमन करता है जिसने संघर्ष की भट्टी में तपकर अपने बेटे को ‘बसंत’ की तरह खिला दिया।

