धमतरी:सिस्टम की संवेदनहीनता का इससे बुरा उदाहरण क्या होगा कि जिस किसान का सब कुछ जलकर राख हो गया हो, पुलिस उसे ढांढस बंधाने के बजाय अपमानित करे। भखारा थाने में पदस्थ प्रधान आरक्षक खिनेश साहू का एक ऐसा ही चेहरा सामने आया है, जिसने खाकी की छवि पर दाग लगा दिया है।
फोन पर खुली पोल: ‘तुम ही दे दो मुआवजा’
घटना के बाद जब पीड़ित मनीष साहू थाने पहुंचा, तो प्रधान आरक्षक ने उसे सहायता देने के बजाय उलटे सीधे सवाल पूछकर मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। उनसे कहां गया कि राजस्व से लिखा के लाओ, विद्युत विभाग से जांच कराके आवो, खम्भा तुमने खेत में क्यो गड़वाई, विद्युत विभाग को खम्बे गढ़ाने का क्या तुमने दिए थे पैसे जो तुम्हे मुआवजा देगा। हद तो तब हो गई जब पीड़ित ने फोन के माध्यम से मीडिया (पत्रकार) से आरक्षक की बात कराई।
पत्रकार से बात करते समय भी आरक्षक का लहजा बिगड़ा हुआ था। उसने कहा … तुम ही दे दो मुआवजा।” हालांकि, जैसे ही उसे स्पष्ट हुआ कि वह सीधे पत्रकार से मुखातिब है, उसके तेवर ढीले पड़ गए और वह आवेदन लेने को राजी हुआ। बाद में यह कहने लगा कि आपको मैं बिजली विभाग का समझ बैठा।
पत्रकार ने संभाला मोर्चा, SDOP से की शिकायत:
पुलिस के इस अड़ियल और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को देखते हुए पत्रकार ने तत्काल मोर्चा संभाला और पूरे घटनाक्रम की जानकारी एसडीओपी रागिनी मिश्रा को दी। पत्रकार ने स्पष्ट किया कि कैसे एक पीड़ित किसान को थाने में न्याय के लिए भटकना और अपमान सहना पड़ रहा है।
एसडीओपी का कड़ा रुख:
शिकायत को गंभीरता से लेते हुए एसडीओपी रागिनी मिश्रा ने कहा है कि:
”किसी भी पीड़ित के साथ ऐसा व्यवहार स्वीकार्य नहीं है। कर्तव्य के प्रति लापरवाही और आम जनता से बदतमीजी करने वाले पुलिसकर्मियों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। किसान की पूरी मदद की जाएगी।”
प्रशासन के लिए सुलगते सवाल:
संवेदनहीनता क्यों? क्या पुलिस का काम केवल रसूखदारों की सुनना है? एक गरीब किसान की फरियाद पर इतना गुस्सा क्यों?
जवाबदेही किसकी? अगर मीडिया हस्तक्षेप न करता, तो क्या उस किसान का आवेदन कभी लिया जाता?
मुआवजे की मांग: प्रशासन कब इस पीड़ित किसान के नुकसान का सर्वे कर उसे राहत राशि प्रदान करेगा?
यह घटना स्पष्ट करती है कि धरातल पर पुलिसिंग की स्थिति क्या है। अब सबकी नजरें पुलिस विभाग की आंतरिक जांच और राजस्व विभाग द्वारा किसान को दी जाने वाली राहत पर टिकी हैं।

