धमतरी। नगरी के वनांचल क्षेत्र में पंचायत व्यवस्था को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। 102 गांवों के सरपंचों का एक साथ सड़क पर उतरना महज विरोध नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर लंबे समय से पल रहे असंतोष का खुला विस्फोट माना जा रहा है। सरपंच संघ ने जनपद पंचायत का घेराव कर जिन आरोपों को सामने रखा, वे पंचायत संचालन की जमीनी हकीकत उजागर करते हैं।
बाइक रैली नहीं, ‘आक्रोश यात्रा’!
सिहावा रोड स्थित सर्व आदिवासी समाज भवन से निकली बाइक रैली केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित विरोध का संकेत थी। “अभद्र व्यवहार नहीं सहेंगे” जैसे नारों के बीच जब सैकड़ों सरपंच जनपद पहुंचे, तो पुलिस की मौजूदगी ने हालात की गंभीरता खुद बयां कर दी। गेट पर रोकने के बाद धरने पर बैठना इस बात का संकेत है कि मामला अब केवल शिकायत तक सीमित नहीं रहा।
सचिवों पर आरोप: लापरवाही या ‘सिस्टमेटिक मनमानी’?
सरपंचों ने सेमरा, आमगांव और भीतररास पंचायतों के सचिवों पर सीधे आरोप लगाए—महिला सरपंचों से अभद्रता, समय पर कार्यालय न पहुंचना, कार्यों में सहयोग न करना। सवाल यह उठता है कि क्या यह केवल कुछ सचिवों की व्यक्तिगत कार्यशैली है या फिर पंचायत तंत्र में जवाबदेही की कमी का बड़ा उदाहरण?
पहले चेतावनी, फिर प्रदर्शन
सरपंच संघ के अध्यक्ष उमेश देव के अनुसार, यह विरोध अचानक नहीं हुआ। लिखित शिकायत, पांच दिन का अल्टीमेटम—सब कुछ पहले ही किया जा चुका था। इसके बावजूद कार्रवाई न होना प्रशासनिक उदासीनता की ओर इशारा करता है। वहीं महासचिव नरेश कुमार मांझी ने साफ कहा—“अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो चक्काजाम होगा।”
प्रशासन का ‘डैमेज कंट्रोल’
जनपद सीईओ रोहित बोरझा ने एक सचिव को हटाने और अन्य के ट्रांसफर प्रस्ताव की बात कही है। लेकिन सवाल यह है कि अगर शिकायतें पहले से थीं, तो कार्रवाई अब तक क्यों टली रही?
मुद्दा केवल व्यवहार का नहीं
यह मामला केवल अभद्रता का नहीं, बल्कि पंचायतों में समन्वय, सम्मान और प्रशासनिक जवाबदेही का है—खासकर तब, जब आदिवासी सरपंचों के साथ व्यवहार पर सवाल उठ रहे हों।
फिलहाल आंदोलन स्थगित है, लेकिन असली परीक्षा अब प्रशासन की है—क्या दो दिन में भरोसा कायम होगा, या नगरी में फिर उग्र आंदोलन देखने को मिलेगा?

