कुरुद। अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के मौके पर इस बार छत्तीसगढ़ में सिर्फ श्रमिकों का सम्मान ही नहीं, बल्कि पारंपरिक खान-पान बोरे-बासी को लेकर भी सियासत खूब गरम रही। एक ओर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता बोरे-बासी खाते हुए तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे थे, तो दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के नेता भी पीछे नहीं रहे और उन्होंने भी इस परंपरा को अपनाते हुए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
संस्कृति या सियासत? दोनों पार्टियां आमने-सामने
बोरे-बासी, जो कि छत्तीसगढ़ का पारंपरिक और श्रमिकों से जुड़ा भोजन माना जाता है, अब राजनीतिक प्रतीक भी बनता जा रहा है। कांग्रेस इसे “छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान” से जोड़कर देख रही है, वहीं भाजपा इसे दिखावा बताकर सवाल उठाती रही है। हालांकि दिलचस्प बात यह रही कि आलोचना के बीच भाजपा नेता और कार्यकर्ता भी बोरे-बासी खाते नजर आए।
सोशल मीडिया बना नया अखाड़ा
इस बार फेसबुक, व्हाट्सएप और अन्य प्लेटफॉर्म पर बोरे-बासी खाते हुए नेताओं की तस्वीरों की जैसे बाढ़ आ गई। हर कोई खुद को ‘जमीन से जुड़ा’ दिखाने की होड़ में नजर आया। वीडियो और फोटो के जरिए यह ट्रेंड पूरे प्रदेश में वायरल हो गया।
धमतरी के कुरुद में भी चर्चा तेज
इसी कड़ी में धमतरी जिले के नगर पालिका कुरुद में भाजपा के पूर्व पार्षद सुनील चंद्राकर की बोरे-बासी खाते हुए तस्वीर सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है। इसको लेकर क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं—कोई इसे संस्कृति से जुड़ाव बता रहा है तो कोई इसे सियासी स्टंट।
परंपरा की ताकत या राजनीति का तड़का?
कुल मिलाकर, बोरे-बासी अब सिर्फ एक पारंपरिक व्यंजन नहीं रहा, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की पहचान और राजनीति का हिस्सा बन चुका है। हर साल 1 मई को यह देखना दिलचस्प होगा कि यह परंपरा कितनी सांस्कृतिक रहती है और कितनी राजनीतिक रंग लेती है।

