धमतरी। ऐसे समय में जब पशुपालन अक्सर मुनाफे तक सीमित होता जा रहा है, धमतरी जिले के नगरी क्षेत्र का पंडरीपानी गांव एक अलग ही कहानी लिख रहा है। यहाँ संचालित श्री श्रृंगी ऋषि गौशाला ने पिछले 18 वर्षों में यह साबित किया है कि सामूहिक प्रयास और सेवा भावना से बेजुबान पशुओं की रक्षा के साथ-साथ आत्मनिर्भरता का मजबूत मॉडल भी खड़ा किया जा सकता है।
वर्ष 2006 में “जियो और जीने दो” के संकल्प के साथ शुरू हुई यह गौशाला आज उपेक्षित और तस्करी के शिकार पशुओं के लिए सुरक्षित ठिकाना बन चुकी है। हाल के महीनों में कई गायों को तस्करी से बचाकर यहां लाया गया है। इन पशुओं को न केवल आश्रय दिया जाता है, बल्कि उनका इलाज कर उन्हें स्वस्थ जीवन भी प्रदान किया जाता है। इस पहल ने गौशाला को करुणा और जिम्मेदारी का प्रतीक बना दिया है।
इस गौशाला की सबसे बड़ी खासियत इसकी कार्यशैली है। यहां सेवा केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि समिति के सदस्य स्वयं प्रतिदिन सुबह साफ-सफाई, चारा व्यवस्था और पशुओं की देखभाल में जुटते हैं। यह समर्पण समाज को यह संदेश देता है कि सेवा तभी प्रभावी होती है जब उसमें व्यक्तिगत भागीदारी हो। यही कारण है कि यह पहल धीरे-धीरे एक जनआंदोलन का रूप लेती जा रही है।
आर्थिक चुनौतियों के बीच भी गौशाला आत्मनिर्भर बनने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रही है। गोबर से ‘गो-काष्ठ’ निर्माण और छेना उत्पादन जैसे प्रयास इसे आय के नए स्रोत प्रदान कर रहे हैं। भविष्य में गोबर और गोमूत्र से अन्य उत्पाद बनाने की योजना इस मॉडल को और मजबूत कर सकती है। यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण में सहायक है, बल्कि ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकती है।
हालांकि, पशु चिकित्सकों की कमी और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं, लेकिन गौशाला प्रबंधन इनसे पीछे हटने को तैयार नहीं है। उनका लक्ष्य स्पष्ट है—गौ सेवा को धार्मिक भावना से आगे बढ़ाकर सामाजिक जिम्मेदारी बनाना।
बहरहाल पंडरीपानी की यह गौशाला आज एक ऐसे मॉडल के रूप में उभर रही है, जो करुणा, सामूहिकता और आत्मनिर्भरता को एक साथ जोड़ती है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस पहल को शासन-प्रशासन से कितना सहयोग मिलता है और क्या यह मॉडल अन्य क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकेगा।

