यशवंत गंजीर धमतरी। कहते हैं इतिहास वही याद रखते हैं जिनके पास फुर्सत होती है, या फिर जिनका चुनावी फायदा जुड़ा होता है। शायद यही वजह है कि 6 जुलाई 1998 के उस ऐतिहासिक पसीने और खून को, जिससे धमतरी जिला बना था, इस बार ‘चुप्पी के मखमली गद्दे’ पर सुला दिया गया।
रायपुर से अलग होकर अपनी पहचान बनाने के लिए कभी धमतरी की सड़कों पर 33 दिनों तक भूख हड़ताल चली थी। पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और आम जनता ने मिलकर वो आंदोलन लड़ा था कि सरकार को झुकना पड़ा। जब जिला बना, तो दिवाली से पहले दिवाली मन गई थी, मिठाइयों के डिब्बे ऐसे खुले मानो कोई जंग जीत ली हो।
28 साल का ‘जवान’ जिला, पर बधाई देने वाला कोई नहीं!
समय का पहिया घूमा और धमतरी अपनी विकास यात्रा के 28वें साल में प्रवेश कर गया। लेकिन इस बार का स्थापना दिवस देखकर लगा मानो जिला कोई ‘सरकारी अनाथालय’ हो।
* न कोई बड़ा तंबू तना।
* न नेताओं की लंबी-चौड़ी तकरीरें हुईं।
* न ही उस ऐतिहासिक संघर्ष को याद करने की किसी ने जहमत उठाई।
> *एक चुभता हुआ सवाल:*
> जब छोटे-मोटे कार्यक्रमों, जयंतियों, पुण्यतिथियों और ‘फोटो खिंचवाओ अभियानों’ के लिए प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के पास बजट और वक्त दोनों होता है, तो धमतरी के अपने ‘वजूद के जन्मदिन’ पर यह सूनापन क्यों? क्या सारा बजट सिर्फ वीआईपी अगवानी के लिए रिजर्व है?
सरकारी कागजों में कैद होता आत्मगौरव
वरिष्ठ नागरिकों और बुद्धिजीवियों के चेहरों पर झुर्रियों से ज्यादा चिंता इस बात की है कि नई पीढ़ी को क्या खाक पता चलेगा कि धमतरी थाली में परोसकर नहीं मिला था, बल्कि छीनकर लिया गया था। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले सालों में धमतरी का स्थापना दिवस सिर्फ ‘सरकारी फाइलों की धूल’ झाड़ने और कैलेंडर की एक लाल तारीख तक ही सिमट कर रह जाएगा।
अब देखना यह है कि अगले साल हमारे आदरणीय हुक्मरानों और जागृत संगठनों की ‘कुंभकर्णी नींद’ टूटती है, या फिर धमतरी का यह गौरव हर साल इसी तरह ‘मौन व्रत’ रखकर अपना जन्मदिन मनाता रहेगा!

