By- यशवंत गंजीर धमतरी/रायपुर
छत्तीसगढ़ विधानसभा में आज का दिन किसी बड़े सियासी थ्रिलर से कम नहीं था। एजेंडा था— ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’। सदन में विधायी चर्चा तो हुई ही, लेकिन असली माहौल बना सत्ता पक्ष के ‘शब्द-बाणों’ और विपक्ष के ‘शोर-शराबे’ से। माहौल ऐसा था कि मानों सदन नहीं, वैचारिक कुरुक्षेत्र सज गया हो।
अजय चंद्राकर के ‘इतिहास-बाण’: पुराने जख्मों पर सियासी मरहम
बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले अजय चंद्राकर ने बैटिंग शुरू करते ही फ्रंट फुट पर आकर हमला बोला। उन्होंने कांग्रेस के इतिहास को कुरेदते हुए कहा कि जिन्होंने कभी “वोट बैंक” की खातिर समाज में दरारें देखीं, वे आज मर्यादा की बात न करें। चंद्राकर ने तंज कसते हुए कहा कि यह विधेयक कोई मामूली कागज नहीं, बल्कि उन दरारों को भरने का एक ‘पवित्र फेवीकोल’ है।
गृह मंत्री विजय शर्मा की ‘चेतावनी’: “अब नहीं चलेगी धर्मांतरण की दुकान”
गृह मंत्री विजय शर्मा आज अपने ‘एंग्री यंग मैन’ वाले अंदाज में थे। उन्होंने धर्मांतरण को एक ‘शांत ज्वालामुखी’ बताते हुए कहा कि इसकी लपटें अब वनांचलों से निकलकर शहरों के ड्रॉइंग रूम तक आ गई हैं। शर्मा ने दो टूक शब्दों में ‘अल्टीमेटम’ दे दिया— “जो आस्था का सौदा करते हैं, वे बोरिया-बिस्तर बांध लें, क्योंकि यह कानून उनकी दुकानदारी पर परमानेंट ताला जड़ने का संकल्प है।” उन्होंने इसे छत्तीसगढ़ की संस्कृति का ‘अभेद्य कवच’ बताया।
विपक्ष का ‘वॉकआउट’ वाला विरोध
दूसरी तरफ, कांग्रेस खेमे में डॉ. चरणदास महंत के नेतृत्व में ‘असंतोष की गर्जना’ सुनाई दी। विपक्ष ने इसे ध्रुवीकरण का टूल बताते हुए जमकर नारेबाजी की। जब चर्चा की कड़वाहट बढ़ने लगी, तो विपक्ष ने बहस के बीच से ही ‘वॉकआउट’ का रास्ता चुना और सदन से बाहर चले गए।
कानून की ‘धार’: सीधे उम्रकैद का प्रहार!
इस नए कानून का कलेवर किसी ‘सियासी वज्र’ जैसा है। अब अगर किसी ने छल, कपट या लालच से किसी का धर्म बदलने की कोशिश की, तो उसे उम्रकैद तक की हवा खानी पड़ सकती है। सरकार का मैसेज क्लियर है— “छत्तीसगढ़ में अब आस्था की चोरी, सबसे भारी पड़ेगी तिजोरी!”
*निष्कर्ष* : विधेयक तो पारित हो गया, लेकिन आज सदन की दीवारों ने जो ‘जुबानी जंग’ सुनी है, उसकी गूंज छत्तीसगढ़ की राजनीति में 2028 के चुनावी दंगल तक सुनाई देगी।

