विशेष रिपोर्ट BY यशवंत गंजीर
बालोद।।छत्तीसगढ़ सरकार और पुलिस प्रशासन ने 31 मार्च 2026 को राज्य से सशस्त्र नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे का ऐतिहासिक दावा किया है। दशकों तक ‘लाल आतंक’ के साये में रहे बालोद जिले के सीमावर्ती इलाकों में अब गोलियों की गूंज शांत है। लेकिन, जैसे ही बंदूकें थमी हैं, एक पुरानी और जानलेवा समस्या ने फिर से सिर उठा लिया है— ‘लाल पानी’ का संकट। जिले के वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए नक्सलवाद का अंत केवल आधी जीत है; असली संघर्ष अब दूषित पानी और बुनियादी सुविधाओं से है।
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नक्सलवाद का अंत: विकास की नई राह?
प्रशासनिक दावों के अनुसार, नक्सलवाद के खात्मे के बाद जिले के अंदरूनी इलाकों में विकास की रफ्तार तेज हुई है। नई सड़कों का जाल बिछ रहा है और सुरक्षा के कड़े घेरे में स्कूल व अस्पतालों का निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर जारी है। पुलिस प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा का माहौल बनने से निवेशकों में भरोसा जागा है।
अतीत के जख्म
बालोद जिले ने नक्सली हिंसा के कई काले दौर देखे हैं। मार्च 2008 में महामाया माइंस से 1750 किलो बारूद की लूट हो या 2010 में राम भरोसा दुग्गा की निर्मम हत्या, इन घटनाओं ने जिले को सालों पीछे धकेल दिया था। जून 2020 में हथियार सप्लाई करने वाले नेटवर्क के भंडाफोड़ के बाद से ही पुलिस ने घेराबंदी तेज कर दी थी, जिसका परिणाम आज ‘नक्सल मुक्त’ जिले के रूप में सामने है।
‘लाल पानी’ ( Red Water ) का डंक
आयरन और भारी धातुओं का खतरा: एक तरफ प्रशासन जश्न मना रहा है, वहीं दूसरी ओर महामाया और दल्लीराजहरा के खनन क्षेत्रों से सटे गांवों में लोग आयरन युक्त लाल पानी पीने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि नक्सली तो चले गए, लेकिन खदानों से निकलने वाला यह ‘लाल जहर’ उनकी हड्डियों को गला रहा है।
स्वास्थ्य का संकट: लाल पानी (Red Water) के सेवन से ग्रामीण किडनी की बीमारियों, त्वचा रोग और कुपोषण का शिकार हो रहे हैं।
अधूरा विकास: वनांचल के निवासियों का मानना है कि जब तक शुद्ध पेयजल और स्थायी रोजगार नहीं मिलेगा, तब तक इस ‘मुक्ति’ का कोई अर्थ नहीं है।
कागजी आंकड़ों से परे की हकीकत
पुलिस की टीमें आज भी सीमावर्ती जंगलों में गश्त कर रही हैं ताकि घुसपैठ न हो सके, जो कि सुरक्षा के लिहाज से सराहनीय है। लेकिन अब समय आ गया है कि प्रशासन अपनी ‘सर्चिंग’ का दायरा बढ़ाकर उन बस्तियों तक पहुंचे जहां नल तो हैं, लेकिन उनमें पानी नहीं, जहर उतर रहा है।
31 मार्च 2026 की तारीख इतिहास में नक्सलवाद की विदाई के लिए दर्ज होगी, लेकिन बालोद के भविष्य के लिए यह जरूरी है कि अब प्रशासन का अगला लक्ष्य ‘स्वच्छ जल और समृद्ध गांव’ हो। लाल आतंक से मिली आजादी तभी सार्थक होगी, जब ‘लाल पानी’ के अभिशाप को जड़ से मिटाया जाएगा।
