नवा रायपुर। छत्तीसगढ़ में न्याय और मानवीय संवेदनाओं का संतुलित संगम एक बार फिर देखने को मिला है। आजीवन कारावास की सजा काट रहे 10 बंदियों की समय-पूर्व रिहाई को मंजूरी देकर राज्य ने यह स्पष्ट किया है कि न्याय केवल दंड नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास का माध्यम भी है। यह निर्णय उन बंदियों के लिए एक नई सुबह लेकर आया है, जिन्होंने 14 वर्षों से अधिक समय जेल की सलाखों के पीछे बिताया और अपने आचरण से बदलाव की राह चुनी।
राज्य दण्डादेश पुनर्विलोकन बोर्ड की बैठक महानिदेशक (जेल) एवं सदस्य सचिव हिमांशु गुप्ता के नेतृत्व में आयोजित की गई। इस दौरान प्रत्येक बंदी के व्यवहार, आयु, मानसिक परिवर्तन और जेल में बिताए गए समय का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया। जेल प्रशासन, संबंधित जिलों के पुलिस अधीक्षक और जिला मजिस्ट्रेट की सकारात्मक रिपोर्ट के आधार पर यह संतोष व्यक्त किया गया कि ये बंदी अब समाज की मुख्यधारा में लौटने के लिए तैयार हैं।
रिहाई की प्रक्रिया को पारदर्शी और जिम्मेदार बनाते हुए प्रशासन ने स्पष्ट शर्तें निर्धारित की हैं। केंद्रीय जेल दुर्ग के प्रेमलाल बंजारे, लोचन सतनामी, ओमप्रकाश, पुरानिक, दलित कुमार, दगन उर्फ रामकुमार, कचरूराम लोधी और पीलूराम तथा केंद्रीय जेल अम्बिकापुर के गोपाल कंवर को सशर्त रिहाई दी जा रही है। इन सभी को 50 हजार रुपये का निजी मुचलका भरना होगा और भविष्य में अपराध से दूर रहने का शपथ-पत्र देना होगा।
वहीं, केंद्रीय जेल रायपुर के बंदी भागीरथी उर्फ भागी को उनकी अधिक आयु और जेल में उत्कृष्ट आचरण को देखते हुए बिना किसी शर्त के रिहा करने का निर्णय लिया गया है। यह निर्णय सुधारात्मक न्याय की उस भावना को दर्शाता है, जहाँ वास्तविक परिवर्तन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।
रायपुर जेल अधीक्षक योगेश सिंह क्षत्री ने बताया कि यह कदम जेल नियम 358 के तहत उठाया गया है। यह नियम इस बात पर बल देता है कि कारावास का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि व्यक्ति का नैतिक और सामाजिक पुनर्निर्माण करना है।
सोमवार को जब ये बंदी जेल से बाहर निकलेंगे, तो वे केवल स्वतंत्रता ही प्राप्त नहीं करेंगे, बल्कि अपने अतीत को पीछे छोड़ एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में नई शुरुआत करेंगे। यह पहल न केवल छत्तीसगढ़ की न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता को दर्शाती है, बल्कि समाज के लिए यह संदेश भी देती है कि हर व्यक्ति को सुधार का एक अवसर अवश्य मिलना चाहिए।

