धमतरी । नियति का क्रूर परिहास देखिए कि जब रबी की स्वर्णिम फसलें खलिहानों की ओर कदम बढ़ा रही थीं, तभी आसमानी आफत ने उम्मीदों पर ओलों की चादर बिछा दी। धमतरी और कुरूद के अंचलों में हुई असामयिक वृष्टि ने न केवल फसलों को धराशायी किया है, बल्कि अन्नदाता के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें भी खींच दी हैं। किंतु अब, प्रकृति के इस आघात से बड़ा संकट ‘समय की दहलीज’ बन चुका है।
समय की सुई और बीमा का विधान
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के कड़े प्रावधानों के अनुसार, आपदा के पश्चात राहत की पात्रता सिद्ध करने के लिए ’72 घंटों’ का एक संकरा द्वार है। रबी सत्र 2025-26 के बीमित कृषकों के लिए यह अनिवार्य है कि वे क्षति का विवरण तीन दिनों के भीतर बीमा प्रदाता तक पहुँचाएँ। विडंबना यह है कि जहाँ खेतों में नमी और मलबे के बीच किसान अपनी आजीविका सहेज रहा है, वहीं घड़ी की टिक-टिक उसके मुआवजे की उम्मीदों को धुंधला कर रही है।
दुर्गम राहें और तकनीकी बाधाएं
यद्यपि प्रशासन ने टोल-फ्री क्रमांक 14447 और 18004190344 के रूप में सहायता के सूत्र जारी किए हैं, किंतु धरातल की वास्तविकता कुछ भिन्न है। ग्रामीण अंचलों में:
नेटवर्क की क्षीणता: डिजिटल संपर्क का मार्ग अवरुद्ध कर रही है।
सूचना का अभाव: जटिल प्रक्रियाओं के कारण सामान्य किसान स्वयं को असहाय पा रहा है।
मैदानी अमला: यद्यपि विभाग और कंपनी के प्रतिनिधि सक्रियता का दावा कर रहे हैं, पर उनकी व्याप्ति हर द्वार तक पहुँचना अब भी एक चुनौती है।
प्रशासनिक आह्वान
कलेक्टर अविनाश मिश्रा ने किसानों को सजग करते हुए आग्रह किया है कि वे इस ‘अंतिम समय सीमा’ की उपेक्षा न करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि आर्थिक क्षतिपूर्ति का मार्ग केवल तत्परता से ही प्रशस्त होगा। किसानों को परामर्श दिया गया है कि वे अविलंब कृषि कार्यालयों या बीमा प्रतिनिधियों के संपर्क में आएँ।
बहरहाल ओलावृष्टि ने केवल फसलों को ही नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता को भी परखा है। जब तक सहायता की यह प्रणाली कागजी जटिलताओं और समय की बेड़ियों से मुक्त होकर सुलभ नहीं होती, तब तक राहत की वर्षा किसानों के मुरझाए चेहरों पर मुस्कान लाने में अधूरी ही रहेगी।
