यशवंत गंजीर धमतरी। मृत्यु के शोक में डूबे परिजनों पर जब अंतिम संस्कार के लिए रास्ता न होने की दोहरी मार पड़े, तो व्यवस्था की संवेदनहीनता चीखने लगती है। धमतरी जिले के नगरी-सिहावा स्थित ग्राम पंचायत खम्हरिया.में पिछले चार वर्षों से यह खौफनाक मंजर आम हो चुका है। यहाँ की सरकारी फाइलों में भले ही तरक्की की चमक हो, लेकिन जमीनी हकीकत में इंसानी लाचारी और प्रशासनिक नाकामी का सबसे क्रूर चेहरा साफ नजर आता है, जहाँ अपनों को मुखाग्नि देने के लिए भी दर-दर भटकना पड़ रहा है।
65 लाख का ‘करप्शन’ और पानी में बही व्यवस्था:
इस महासंकट की जड़ में गांव और पारंपरिक श्मशान को अलग करने वाला तेरगी नाला है। साल 2008 में इस नाले पर करीब ₹65 लाख की भारी-भरकम राशि से एक पुल बनाया गया था। लेकिन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा यह घटिया निर्माण पहली ही बड़ी बाढ़ में ताश के पत्तों की तरह ढह गया। आज नाले के सीने पर खड़े इसके खोखले अवशेष प्रशासनिक भ्रष्टाचार की गवाही दे रहे हैं।
मानवीय गरिमा का सरेआम चीरहरण:
पुल टूटने के बाद अब ग्रामीण खेतों की संकरी मेड़ों से संतुलन बनाकर, जान जोखिम में डालकर अर्थियां ले जाने को मजबूर हैं।बारिश में जब नाला उफान पर होता है, तब मजबूरी में नाले के किनारे ही अंतिम संस्कार करना पड़ता है। जगह की कमी के कारण कई बार पुराने शवों के अवशेष तक बाहर आ जाते हैं, जो मानवीय गरिमा का सरेआम चीरहरण है।
खोखले आश्वासनों के खिलाफ अब ‘आर-पार की जंग’:
ग्राम पंचायत खम्हरिया के सरपंच संतकुमार मरकाम और आक्रोशित ग्रामीणों का सब्र अब टूट चुका है। अधिकारियों के चक्कर काट-काटकर थक चुके ग्रामीणों ने प्रशासन को दो टूक चेतावनी दे दी है। सरकार के ‘सुशासन तिहार’ के तुरंत बाद, यानी 20 जूनसे ग्रामीण अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन का बिगुल फूंकने जा रहे हैं। ग्रामीणों का साफ कहना है—जब तक नया पुल और श्मशान का रास्ता स्वीकृत नहीं होता, यह आंदोलन थमेगा नहीं।

