(मनमोहन चंदौली)
चंदौली। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन (डीडीयू) पर अवैध वेंडरिंग का खेल अब किसी से छिपा नहीं रह गया है। स्टेशन परिसर से लेकर ट्रेनों तक लाइसेंस की आड़ में बाहरी लोगों से खुलेआम वेंडिंग कराई जा रही है लेकिन जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठे हैं। सवाल यह है कि आखिर रेलवे स्टेशन पर इतना बड़ा नेटवर्क किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है?
सूत्रों के अनुसार स्टेशन पर अधिकृत स्टॉल संचालित करने वाले मुख्य रूप से दो लाइसेंसधारी ही इस पूरे नेटवर्क की असली कड़ी बने हुए हैं। आरोप है कि अपने लाइसेंस और स्टॉल की आड़ में अवैध वेंडरों की फौज खड़ी कर ट्रेनों और प्लेटफॉर्मों पर बड़े पैमाने पर सामान बिकवाया जा रहा है। इस मामले में दो व्यक्तियों का नाम मुख्य रूप से सामने आता रहा है
सबसे बड़ा सवाल रेलवे की उन एजेंसियों पर खड़ा हो रहा है जिनकी जिम्मेदारी ही स्टेशन की निगरानी और व्यवस्था संभालने की है। प्लेटफॉर्मों पर खुलेआम घूमते अवैध वेंडर क्या आरपीएफ को दिखाई नहीं देते? क्या कमर्शियल विभाग को यह पता नहीं कि लाइसेंस किसके नाम पर है और काम कौन कर रहा है? क्या स्टेशन प्रशासन को प्लेटफॉर्मों पर बढ़ती अव्यवस्था नजर नहीं आ रही?
चर्चा यह भी है कि बिना विभागीय “सेटिंग” के इतनी बड़ी संख्या में अवैध वेंडरों का संचालन संभव ही नहीं है। यही वजह है कि अब आरपीएफ, कमर्शियल विभाग, स्टेशन प्रशासन, कैटरिंग व्यवस्था से जुड़े अधिकारी और अन्य संबंधित एजेंसियां भी सवालों के घेरे में हैं।
यात्रियों का कहना है कि अवैध वेंडरिंग के कारण प्लेटफॉर्मों पर भीड़, गंदगी, अव्यवस्था और सुरक्षा संबंधी खतरे लगातार बढ़ रहे हैं। ट्रेनों में बिना पहचान वाले लोगों की आवाजाही यात्रियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
विडंबना यह है कि रेलवे समय-समय पर अवैध वेंडरों के खिलाफ अभियान चलाने का दावा करता है लेकिन डीडीयू जंक्शन पर यह कारोबार पहले की तरह ही फल-फूल रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि कार्रवाई सिर्फ दिखावे के लिए होती है या फिर पूरा सिस्टम ही इस खेल पर मेहरबान है।
अब जरूरत इस बात की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए तथा अवैध वेंडरिंग को संरक्षण देने वालों पर कठोर कार्रवाई हो ताकि यात्रियों की सुरक्षा और रेलवे व्यवस्था दोनों को बचाया जा सके

