कुरुद। डिजिटल युग में सूचना का प्रवाह जितना तेज हुआ है, उतनी ही तेजी से पत्रकारिता के स्वरूप में बदलाव भी देखने को मिल रहा है। अब खबरें घंटों की मेहनत, जमीनी पड़ताल और तथ्य-सत्यापन के बजाय कुछ ही मिनटों में तैयार होकर पाठकों तक पहुंच रही हैं। इस बदलाव के केंद्र में है—कृत्रिम मेधा (एआई) का बढ़ता और कई मामलों में अनियंत्रित उपयोग, जिसने खबर और ‘कंटेंट’ के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है।
खोजी पड़ताल में खुलासा: बिना जांच के खबरें प्रकाशित
खोजी पड़ताल में सामने आया है कि कई नए और उभरते समाचार पोर्टल बिना किसी ठोस स्रोत या स्थल निरीक्षण के सीधे एआई उपकरणों के सहारे खबरें प्रकाशित कर रहे हैं। इन खबरों की भाषा भले ही आकर्षक और सुसज्जित दिखाई देती हो, लेकिन उनमें तथ्यात्मक गहराई और विश्वसनीयता का अभाव साफ झलकता है। इतना ही नहीं, कई बार खबरों के साथ कृत्रिम रूप से निर्मित तस्वीरें भी जोड़ी जा रही हैं, जिससे पाठकों के बीच भ्रम की स्थिति बन रही है।
संपादकीय गुणवत्ता पर उठते सवाल
स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है, जब बिना पत्रकारिता की मूल समझ रखने वाले लोग भी स्वयं को ‘संपादक’ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। एआई की मदद से भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग कर खबरों को प्रभावशाली बनाने की कोशिश तो की जाती है, लेकिन उनमें न संवेदनशीलता होती है और न ही वास्तविकता का प्रतिबिंब। परिणामस्वरूप, पाठकों का भरोसा धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा है।
विशेषज्ञों की राय: एआई सहायक है, विकल्प नहीं
विशेषज्ञों का मानना है कि एआई एक सहायक उपकरण हो सकता है, लेकिन यह पत्रकारिता का विकल्प नहीं बन सकता। इसका उपयोग डेटा विश्लेषण, तथ्य संकलन और तकनीकी कार्यों तक सीमित रहना चाहिए, ताकि पत्रकार गहराई से सोचने, समझने और विश्लेषण करने पर ध्यान केंद्रित कर सकें। यदि मशीनें ही खबर लिखेंगी और पत्रकार केवल उसे प्रकाशित करेंगे, तो यह पेशे के मूल उद्देश्यों के साथ गंभीर समझौता होगा।
आत्ममंथन की जरूरत: भरोसा बचाना सबसे बड़ी चुनौती
ऐसे समय में जरूरत है आत्ममंथन की। पत्रकारों और समाचार संस्थानों को यह समझना होगा कि पाठकों को केवल त्वरित सूचना नहीं, बल्कि सत्य, संतुलित और विश्वसनीय खबरें चाहिए। टीआरपी और लोकप्रियता की दौड़ में खबरों की आत्मा को खो देना न केवल पत्रकारिता के लिए घातक है, बल्कि समाज को गुमराह करने का खतरा भी बढ़ाता है।
