वन भूमि पर कब्जे का खेल: पैसा लेकर कब्जा कराने के आरोप, 43 लोगों को नोटिस देकर क्या अपनी भूमिका छुपा रहा वन विभाग ..

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By- Kuleshwar Kushwaha

बलरामपुर जिले के रघुनाथनगर वन परिक्षेत्र अंतर्गत ग्राम पण्डरी में वन विभाग द्वारा 43 लोगों को अतिक्रमण हटाने का नोटिस जारी किए जाने के बाद मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। वन विभाग ने नोटिस के माध्यम से संबंधित लोगों को तीन दिनों के भीतर वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। चेतावनी दी गई है कि दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करने की स्थिति में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई वास्तव में होगी या फिर हमेशा की तरह “कागजी नोटिस” तक ही सीमित रह जाएगी?

*एक बार में कब्जा नहीं, तो एक बार में कार्रवाई कैसे.*

ग्रामीणों और स्थानीय लोगों का कहना है कि पण्डरी गांव में वन भूमि पर कब्जा एक दिन या एक बार में नहीं हुआ है। वर्षों से धीरे-धीरे 43 से अधिक लोगों द्वारा कब्जा किया गया है। ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि जब कब्जा लगातार हो रहा था, तब वन विभाग क्या कर रहा था? स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह सब कुछ वन विभाग की मिलीभगत के बिना संभव ही नहीं है। यदि समय रहते कार्रवाई की जाती, तो आज हालात इतने गंभीर नहीं होते।

*प्रभारी रेंजर पर गंभीर आरोप  .*

इस पूरे मामले में रघुनाथनगर के प्रभारी रेंजर शिवनाथ ठाकुर पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि उन्होंने पैसा लेकर वन भूमि पर कब्जा कराया है। ग्रामीणों का कहना है कि जब शिवनाथ ठाकुर सिपाही के पद पर थे, तभी से पैसे लेकर कब्जा करवाने का खेल शुरू हो गया था और आज प्रभारी रेंजर बनने के बाद उनका हौसला और बुलंद हो गया है।

*15–20 वर्षों से एक ही रेंज में पदस्थापना  …*

सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि शिवनाथ ठाकुर का 15 से 20 वर्षों से एक ही रेंज में पदस्थ रहना आखिर कैसे संभव हुआ। सिपाही से लेकर प्रभारी रेंजर तक का पूरा कार्यकाल इसी रघुनाथनगर रेंज में गुजरना, विभागीय नियमों और पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।

*लंबी पदस्थापना बनी कब्जे की वजह.*

ग्रामीणों का कहना है कि इतने लंबे समय तक एक ही रेंज में पदस्थापना रहने के कारण ही वन भूमि पर अवैध कब्जे को बढ़ावा मिला। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या उच्च अधिकारियों की जानकारी में यह सब हो रहा था? या फिर ऊपर तक “सेटिंग” का खेल चलता रहा ? कार्रवाई सिर्फ अतिक्रमणकारियों पर, अधिकारी पर क्यों नहीं? यदि वाकई अवैध कब्जा हुआ है, तो कार्रवाई सिर्फ कब्जाधारियों पर ही क्यों? प्रभारी रेंजर पर पैसे लेकर कब्जा कराने के आरोप हैं, उसके खिलाफ अब तक कोई विभागीय जांच या कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
वन विभाग की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि नोटिस देकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा और कुछ समय बाद वही खेल फिर से शुरू हो जाएगा?

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