By- Kuleshwar Kuswaha
बलरामपुर– जिले के कुसमी में एसडीएम मारपीट से हुई मौत का मामला अब सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं रह गया है, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा कर रहा है। दूसरे दिन भी कुसमी बस स्टैंड पर ग्रामीणों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं का धरना जारी रहा। पूर्व मंत्री अमरजीत भगत सहित कई नेता मौके पर मौजूद रहे और शासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई।
अब इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
जानिए क्या है पूरा मामला ..
जानकारी के मुताबिक, कुसमी एसडीएम करूण डहरिया और नायब तहसीलदार पारस शर्मा राजस्व टीम के साथ रविवार देर शाम हंसपुर पहुंचे थे। टीम वहां बॉक्साइट के अवैध उत्खनन की जांच कर रही थी। रात में 9 बजे हंसपुर के 3 ग्रामीण सरना के पास टीम को मिले। आरोप है कि एसडीएम, नायब तहसीलदार और उनके साथ मौजूद युवकों ने तीनों ग्रामीणों को लाठी और लात-घूंसों से पीटा। इसके बाद तीनों को गाड़ी में बैठाकर कुसमी ले जाया गया। रास्ते में एक ग्रामीण की हालत बिगड़ गई और वह बेहोश हो गया।
अस्पताल में एक की मौत, दो घायल…
रास्ते में एक ग्रामीण के बेहोश होने के बाद टीम तीनों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कुसमी लेकर पहुंची। इलाज के दौरान राम नरेश राम (60) की मौत हो गई। घायलों में अजीत उरांव (60) और आकाश अगरिया (20) शामिल हैं।

🔴 सिस्टम पर 5 बड़े सवाल

🔴 सिस्टम पर 5 बड़े सवाल
1. क्या जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों की जवाबदेही तय है?
जब एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ही गंभीर आरोपों में घिर जाए, तो आम जनता किस पर भरोसा करे? क्या सिस्टम में आंतरिक निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था प्रभावी है?
2. क्या शक्ति का दुरुपयोग रोका जा पा रहा है?
सरकारी पद का उद्देश्य कानून लागू करना है, न कि कानून को हाथ में लेना। यदि आरोप सही हैं तो यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं अधिकारों के दुरुपयोग को रोकने वाली व्यवस्था कमजोर है।
3. क्या न्याय केवल गिरफ्तारी तक सीमित रहेगा?
पुलिस ने आरोपी एसडीएम सहित चार लोगों को जेल भेज दिया है। लेकिन क्या गिरफ्तारी ही पर्याप्त है? क्या निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुनिश्चित होगी, जिससे दोषियों को उदाहरणात्मक सजा मिल सके?
4. क्या राजनीतिक दबाव के बिना कार्रवाई संभव है?
घटना के बाद विपक्षी नेताओं के मैदान में उतरते ही कार्रवाई तेज हुई। इससे सवाल उठता है कि यदि राजनीतिक दबाव न होता, तो क्या प्रक्रिया इतनी ही तेजी से आगे बढ़ती?
5. क्या जनता का भरोसा बचा रहेगा?
किसी भी शासन की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है। जब प्रशासनिक तंत्र पर ही सवाल उठने लगें, तो भरोसा डगमगाने लगता है। ऐसे में सरकार और प्रशासन के लिए जरूरी है कि वे पारदर्शी कार्रवाई कर विश्वास बहाल करें।
जब एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ही गंभीर आरोपों में घिर जाए, तो आम जनता किस पर भरोसा करे? क्या सिस्टम में आंतरिक निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था प्रभावी है?
2. क्या शक्ति का दुरुपयोग रोका जा पा रहा है?
सरकारी पद का उद्देश्य कानून लागू करना है, न कि कानून को हाथ में लेना। यदि आरोप सही हैं तो यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं अधिकारों के दुरुपयोग को रोकने वाली व्यवस्था कमजोर है।
3. क्या न्याय केवल गिरफ्तारी तक सीमित रहेगा?
पुलिस ने आरोपी एसडीएम सहित चार लोगों को जेल भेज दिया है। लेकिन क्या गिरफ्तारी ही पर्याप्त है? क्या निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुनिश्चित होगी, जिससे दोषियों को उदाहरणात्मक सजा मिल सके?
4. क्या राजनीतिक दबाव के बिना कार्रवाई संभव है?
घटना के बाद विपक्षी नेताओं के मैदान में उतरते ही कार्रवाई तेज हुई। इससे सवाल उठता है कि यदि राजनीतिक दबाव न होता, तो क्या प्रक्रिया इतनी ही तेजी से आगे बढ़ती?
5. क्या जनता का भरोसा बचा रहेगा?
किसी भी शासन की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है। जब प्रशासनिक तंत्र पर ही सवाल उठने लगें, तो भरोसा डगमगाने लगता है। ऐसे में सरकार और प्रशासन के लिए जरूरी है कि वे पारदर्शी कार्रवाई कर विश्वास बहाल करें।
मांगें और आगे की राह।

धरने पर बैठे ग्रामीण और कांग्रेस कार्यकर्ता मृतक परिवार को 1 करोड़ रुपये मुआवजा और एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की मांग पर अड़े हैं। आंदोलनकारी साफ कह रहे हैं कि जब तक लिखित आश्वासन नहीं मिलेगा, आंदोलन जारी रहेगा।
कुसमी की यह घटना केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन चुकी है। अब देखना होगा कि सरकार और सिस्टम इस चुनौती का सामना किस तरह करते हैं — औपचारिक कार्रवाई से या ठोस सुधारात्मक कदमों

